अध्याय 225

समर की नज़र से

"समर… हे भगवान, समर, जब मुझे फ़ोन आया—" वो मेरे ऊपर झुकी, मेरे शरीर पर हाथ फेर-फेरकर चोटें ढूँढ़ने लगी। पाइप को कसकर पकड़ने से मेरी हथेलियों पर पड़े छोटे-छोटे कट उसकी काँपती उँगलियों को मिल गए; और कंधे पर उभरती नीली-सी सूजन भी, जहाँ मैं गोदाम की दीवार से टकरा गई थी। "तुम्हें चोट ...

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